

स्टेट हेड महेन्द्र सोनवानी की रिपोर्ट।
कोरबा // पोड़ी उपरोड़ा विकासखंड स्थित पिपरिया धान मंडी में आदिवासी कृषकों की बदहाली और अव्यवस्था अब खुलकर सामने आने लगी है। एक ओर छत्तीसगढ़ शासन किसानों के हित में पारदर्शी धान खरीदी और सुविधाजनक व्यवस्था का दावा कर रही है, वहीं दूसरी ओर पिपरिया मंडी की जमीनी सच्चाई इन दावों को कठघरे में खड़ा कर रही है। यहां किसानों को सुबह से रात तक भटकाया जा रहा है, उनसे ही काम कराया जा रहा है और तौल में अनियमितताओं के आरोप लग रहे हैं।
ग्रामीण आदिवासी अंचल की इस मंडी में धान बेचने पहुंचे किसानों ने बताया कि पर्ची के नाम पर उन्हें पूरे दिन इधर-उधर घुमाया जाता है। कभी कहा जाता है “अभी नहीं होगा”, कभी “वहां जाकर पता करो”, तो कभी “कल आना”। इसी असमंजस में दिन ढल जाता है और किसान भूखे-प्यासे रात होने तक मंडी परिसर में खड़े रहते हैं। न बैठने की व्यवस्था, न पीने के पानी की, न छांव की—सरकारी उपार्जन केंद्र की यह तस्वीर बेहद शर्मनाक है।
किसानों से कराया जा रहा मंडी का काम
सूत्रों के अनुसार मंडी में कर्मचारियों की भूमिका सीमित नजर आती है, जबकि बोरा उठाने, इधर-उधर ले जाने और लाइन संभालने जैसे काम किसानों से ही कराए जा रहे हैं। जो किसान इसका विरोध करता है, उसे और परेशान किया जाता है। इससे साफ है कि किसानों को जानबूझकर मानसिक रूप से थकाया जा रहा है, ताकि वे किसी तरह की शिकायत न कर सकें।
तौल में गड़बड़ी के भी आरोप
किसानों ने यह भी आरोप लगाया कि मंडी में तौल के दौरान ज्यादा धान लिया जा रहा है। घंटों की भागदौड़ और भूख-प्यास से परेशान किसान मजबूरी में चुप रह जाते हैं। यह स्थिति आदिवासी और छोटे कृषकों के शोषण की ओर गंभीर इशारा करती है।
सवालों से बचते दिखे जिम्मेदार
जब हमारी टीम ने इस अव्यवस्था और किसानों के आरोपों को लेकर मंडी प्रबंधक एवं जीवामदार अधिकारी से बात करने का प्रयास किया, तो उनकी प्रतिक्रिया और भी चौंकाने वाली रही। पूछताछ के दौरान वे साफ जवाब देने के बजाय टालमटोल करते नजर आए। कभी कहा—“मैं जहां हूं, वहीं हूं”, कभी—“यहां नहीं हूं, यहीं से देख रहा हूं।” इस तरह के गोलमोल और भ्रमित करने वाले जवाबों ने कई सवाल खड़े कर दिए।
स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि व्यवस्था सही होती और सब कुछ नियमों के अनुसार चल रहा होता, तो जिम्मेदार अधिकारी स्पष्ट जवाब देने से क्यों बचते? गोलमोल जवाब खुद ही किसी न किसी गड़बड़ी और संभावित भ्रष्टाचार की ओर संकेत करते हैं।
सरकार की मंशा पर भारी पड़ता स्थानीय तंत्र
एक तरफ राज्य सरकार आदिवासी अंचलों के कृषकों को सशक्त बनाने, उनकी उपज का सही मूल्य दिलाने और सम्मानजनक व्यवस्था देने की बात कर रही है, वहीं दूसरी ओर पिपरिया धान मंडी की स्थिति सरकार की मंशा पर पानी फेरती नजर आ रही है। यहां की लापरवाही और जवाबदेही से बचने का रवैया शासन की छवि को नुकसान पहुंचा रहा है।
प्रशासन से सख्त कार्रवाई की जरूरत
अब जरूरत है कि जिला प्रशासन तत्काल संज्ञान ले, पिपरिया धान मंडी की व्यवस्था की निष्पक्ष जांच कराए, तौल, पर्ची वितरण और कर्मचारियों की भूमिका की पड़ताल करे तथा जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय करे।
यदि समय रहते ठोस कार्रवाई नहीं हुई, तो यह साफ हो जाएगा कि किसानों की परेशानी और शोषण को नजरअंदाज किया जा रहा है—जो किसी भी हाल में सरकार की मंशा के अनुरूप नहीं कहा जा सकता।




