

छत्तीसगढ़//कोरबा इन दिनों गांवों शहरों सभी क्षेत्रों में सुआ नृत्य खूब आकर्षण बनी हुई है।
बतादें सुआ नृत्य की संस्कृति छत्तीसगढ़ में सालों से चली आ रही है।
यह लोक नृत्य महिलाएं समूह में करती हैं।
जो घर घर जाकर सुआ गीत गाती हैं। और साथ ही नृत्य करते हैं।
इस लोक नृत्य में धान से भरी टोकरी में मिट्टी का सुआ रखती हैं।
जिसके चारों तरफ घूमते हुए नृत्य करते हैं। ये नृत्य प्रदेश की पुरानी परंपराओं में से एक है। हमारे छत्तीसगढ़ प्रदेश में दान की परंपरा चलती आ रही है। यदि कोई किसी को कुछ देता है तो बदले में उसका आभार व्यक्त करने के लिए कुछ भेंट दी जाती है, ऐसा ही सुआ नृत्य करने वाले टोलियों को लोग भेंट स्वरूप चांवल, धान,रुपए, आदि देते हैं।
ऐसा ही इन दिनों कोरबा के ग्रामीण अंचलों में सुआ नृत्य, डंडानृत्य का खुमार छाया हुआ है।
यह नृत्य छेरछेरा पर्व तक चलती रहेगी। यह नई फसल के घर आने की खुशी और दान पुण्य का पर्व है।
जिसमें समाज के सभी वर्गों को एकजुट किया जाता है लोग एक दूसरे से मिलकर खुशियां बांटते हैं और यह गावों में उत्साह और सामूहिकता का माहौल बनाता है।




